THE ALMANAC OF TIME
–DYLAN THOMAS
वक़्त की जंत्री
वक्त की जंत्री ज़ेहन में टँगी है;
भीतर
तय करता है मौसम
आफ़ताब,
आदम की गहराइयों में
रिसते जाते हैं
सर्द साल;
उसका लेखाचित्र
सुर्ख़ -कोख कलम की स्याही से
उकेरा गया दर्द का एक वर्क हो जैसे!
उम्र की जंत्री दिल में टँगी है
एक आशिक़ की मुसलसल सोच
फाड़ देती है
तारीख़ों से भरा सफ़हा,
वक़्त के हर
एक इंच लम्हे को
जवानी और बुढ़ापे की रस्साकशी
एक फुट तलक लंबा खेंच देती है,
दिन और रात फ़ानी होने की कवायद करते हैं...
वक्त के अल्फाज़
बिखरे पड़े हैं
बेजोड़ पिंजर पर ,
जांघों में महफूज़ है वक्त के बीज;
जिंदगी
कतरा कतरा जी रही है
आफ़ताब की गुनगुनी गरमाई में,
लफ़्ज़ों का तलफ़्फ़ुज़ बेहिसाब जारी रहेगा
वक्त का आदम से वाबस्ता रहेगा!
@Chandrashekhar B.Sharma[ALL RIGHTS RESERVED]
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