My Last Duchess
-- ROBERT BROWNING
मेरी आखरी बेग़म
यह है मेरी आखरी बेग़म की तस्वीर,
लग रहा है ना ,जैसे यह जिंदा हो?
इसे तो अब मैं कुदरत का करिश्मा मानता हूँ;
फ्रा पेंडोल्फ़ की रँगसाजी ने
मेहनती हाथों की कलाकारी ने
इस खूबसूरत तस्वीर में जान फूँकी है,
और देखो आज हमारी बेग़म साहिबा
यहाँ नोश फरमा रहीं है!
अरे जनाब,आप तशरीफ़ तो रखिये
और एक मर्तबा,
सिर्फ एक मर्तबा इस तस्वीर पर गौर फरमाइए !
मैंने जानबूझकर फ्रा पेंडोल्फ़ कहा,
क्योंकि किसी भी अजनबी ने
इतने गौर से
इस तस्वीर पर नज़र नहीं डाली,
कितनी गहराई
बेइंतहा जुनून…
पाकीज़ा रूहानियत
छलक रही है चेहरे से...
सुनो !अक्सर वे मेरी ओर देखते थे
(क्योंकि सिर्फ तुम्हारे लिए ये चिलमन मैंने सरकाई है)
लगता था कि वे पूछ बैठेंगे मुझसे ,
गर हिम्मत जुटा पाए तो,
कि ये तासुर चेहरे पर कैसे आ गया ?
तो तुम पहले नहीं हो
जो इस तरह का सवाल पूछ रहे हो।
हज़रात ,क्या बताऊँ!
ये तासुर ,सिर्फ ,उसके नवाब की मौजूदगी नहीं थी,
जिसे हम कहते हैं
बेग़म के रुख़सार पर डोलते खुशी के भँवर...
शायद फ्रा पेंडोल्फ़ ने
मौका मिलते ही कहा होगा,
"मोहतरमा,आपका लिबास
कलाई को बहुत ज्यादा ढक रहा है,"
या
"ये रँग भी उम्मीद ना करें कि वे उकेर सकतें हैं
आपकी अध-खिली मुस्कान
जो दमकने के पहले दम तोड़ देती है हलक़ पर!"
ऐसी बेहुदा बातें ,
खुश अख़लाक़ी थी,उसने सोचा,
और वह वजह बन गयी
भँवर रुख़सार की
मुस्कान की...
उसका जो दिल था,हाय!
कैसे बयाँ करूँ मैं?
बेहद खुश होने वाला
बहुत आसानी से पसीजने वाला;
जिसे देखती उसी को अच्छा मानती,
और तो और हर नाचीज़ पर
नज़रें करम करती।
जनाब!सभी पर!
उसके रुख़सार से मेरा रूबरू होना,
पश्चिम में कतरा कतरा आफ़ताब का डूबना,
किसी तीमारदार का
बागीचे से तोड़ी हुई सुर्ख़ लीचियाँ का लाना,
सफेद घोड़े पर सवार होकर घूमना---
हर चीज़,
हर एक चीज़ उसे खुश करती थी,
और वह हर फ़र्द का शुक्रियादा करती थी
या फिर कभी-कभी मुस्कुरा देती,
या फिर कम से कम लजा जाती,
शर्माती!
चलो ठीक है
वह तीमारदारों का शुक्रियादा करती---
बहुत अच्छी बात है!
मगर शुक्रियादा ऐसे---
कैसे बताऊँ?
जैसे वह एक ही तराजू में
मेरे नौ सौ साल पुराने खानदानी नाम के तोहफे को
दूसरों के गलीज़ तोहफों के साथ तोल रही हो!
कौन गिरता इतने नीचे
ऐसी घटिया हरकत देखकर
इल्ज़ाम लगाने के वास्ते?
गर
तुम्हारे पास हुनर है बोलने का--
जोकि मेरे पास नहीं है--
मुँहफट होकर
साफ साफ कहने का--
"कि बस बहुत हुआ
इससे
उससे
मुझे गुस्सा आता है
ये तुमने अच्छा नहीं किया
वहाँ बेहद ज्यादा कर दिया तुमने!"--
और गर वो समझ भी जाती
झुक जाती
तो अच्छा होता
पर उसने अपनी अक्ल का इस्तेमाल नहीं किया
बहानों का पिटारा मेरे सामने खोल दिया!
और मैं
मैं तो ये सब समझ नहीं सकता था
झुक नहीं सकता था!
अरे जनाब वह मुस्कुराती थी,खैर!
जब भी मैं उसके नजदीक से गुजरता था,
मगर कौन है वह
जिसने वह मुस्कान नहीं देखी?
यह तमाशा बहुत बढ़ने लगा;
मैंने हुकुम दिया;
और एक ही झटके में
मुस्कान काफ़ूर हो गयी!
देखो !यहाँ बेगम नोश फरमा रहीं है
जैसे जिंदा हो!
आइए हज़रात नीचे चलते हैं
कुछ लोगों से मुलाकात हो जाएगी।
मैं दोहरा रहा हूँ,
अपने अमीर
दिलदार नवाब को बता दीजियेगा
कि मुझे अच्छे जहेज़ से महरूम नहीं रखा जाएगा;
वैसे उनकी फर्माबदार
खूबसूरत बेटी ही
काफी है मेरे लिए!
चलिए,नीचे चलिए,जनाब!
देखिए नेपटुन, कैसे समुद्री-घोड़े को हाँक रहे हैं,
गजब का मुजसमा है
इंन्सबर्क के जागीरदार ने काँसे में
खास मेरे लिए गढ़ा था!
@Chandrashekhar B.Sharma [ALL RIGHTS RESERVED]
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