Monday, September 26, 2022

The Darkling Thrush -- THOMAS HARDY

                                                                     The Darkling Thrush

-- THOMAS HARDY


कजरारी गौरैया


टेक लगाए खड़ा हुआ था 

काठ-फाटक पर मैं,

चहुँ ओर पसरा था अँधेरा 

 थामे पाला प्रेत-सफेद,

सर्दियों के कोहरे ने ओढ़ा 

सन्नाटे का पाला

चढ़ते दिन की चमकती आँखों को

 किया धुँधला-काला।

आसमाँ को छूती-नापती 

उलझी-लचीली बेलें

जैसे उलझे तार लायर के

इस कजलाये मौसम में ,

मानवजाति तन सेकती

जलते चूल्हों की बुक्कल में

सुनसान-बसाहत ताड़ती ख़ामोशी 

हर घर,आँगन में!


जमीं-मंज़र के तीखे नैन-नक़्श

एक बिछी सदी की लाश

उसका तहखाना घने बादलों की 

कारी-छतरी समान

हवा का बहना संकेत मौत का

संगीत रुदाली-गान

प्राचीन थिरकन बीज-अंकुर की

सिकुड़ गयी सूखी-पाषाण,

जमीं पर हर शख़्स हो गया 

निस्तेज ,मेरे समान।


अचानक एक तान छिड़ी

अँधेरी धूसर टहनियों में

गा रही थी सुरीले स्वर में

बूढ़ी गौरैया मधु-गीत खुशी से!

 कमजोर,दुबली ,मरियल और नन्ही

उलझे पँख तूफां में

रूह को ऐसे झकझोरा जोर से

फ़ुर्र हो गयी मनहूसियत कुदरत से!


इतनी सी वजह बनी खुशी-गीत की

ऐसी मधुर-सुरीली तान

रची गयी तूफान-लहर पर 

दिलासा दे गई चहुँ ओर मुझे एक समान!

कँपकपाने लगी रात घनेरी

हवा का रुख़ भी बदला

उम्मीद जगाई भरी रात में

मुझ अनजान को दिया हौसला!



@Chandrashekhar B.Sharma [ALL RIGHTS RESERVED]


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