The Darkling Thrush
-- THOMAS HARDY
कजरारी गौरैया
टेक लगाए खड़ा हुआ था
काठ-फाटक पर मैं,
चहुँ ओर पसरा था अँधेरा
थामे पाला प्रेत-सफेद,
सर्दियों के कोहरे ने ओढ़ा
सन्नाटे का पाला
चढ़ते दिन की चमकती आँखों को
किया धुँधला-काला।
आसमाँ को छूती-नापती
उलझी-लचीली बेलें
जैसे उलझे तार लायर के
इस कजलाये मौसम में ,
मानवजाति तन सेकती
जलते चूल्हों की बुक्कल में
सुनसान-बसाहत ताड़ती ख़ामोशी
हर घर,आँगन में!
जमीं-मंज़र के तीखे नैन-नक़्श
एक बिछी सदी की लाश
उसका तहखाना घने बादलों की
कारी-छतरी समान
हवा का बहना संकेत मौत का
संगीत रुदाली-गान
प्राचीन थिरकन बीज-अंकुर की
सिकुड़ गयी सूखी-पाषाण,
जमीं पर हर शख़्स हो गया
निस्तेज ,मेरे समान।
अचानक एक तान छिड़ी
अँधेरी धूसर टहनियों में
गा रही थी सुरीले स्वर में
बूढ़ी गौरैया मधु-गीत खुशी से!
कमजोर,दुबली ,मरियल और नन्ही
उलझे पँख तूफां में
रूह को ऐसे झकझोरा जोर से
फ़ुर्र हो गयी मनहूसियत कुदरत से!
इतनी सी वजह बनी खुशी-गीत की
ऐसी मधुर-सुरीली तान
रची गयी तूफान-लहर पर
दिलासा दे गई चहुँ ओर मुझे एक समान!
कँपकपाने लगी रात घनेरी
हवा का रुख़ भी बदला
उम्मीद जगाई भरी रात में
मुझ अनजान को दिया हौसला!
@Chandrashekhar B.Sharma [ALL RIGHTS RESERVED]
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