THE WILD SWANS AT COOLE
--W.B.Yeats
राजहंस
शरद ऋतू का सौन्दर्य दरख्तों पर है ,
वनपथ शुष्क पड़े हैं
अश्विन के संधी प्रकाश में
प्रतिबिम्बित हो रहा है व्योम निश्चल;
पाषणों के बीच लबालब पोखर में है
नौ और पचास राजहंस |
उन्नीसवे शरद ने मुझे स्पर्श किया है
जब पहली बार मैंने उन्हें गिना था
देखा था उन्हें
और इसके पहले कि गिनती खत्म हो
यकायक सभी उड़ने लगे --
तितर-बितर होने लगे व्योम विशाल में
पंख फड़फड़ाते हुए --
कोलाहल करते हुए |
देखा है उन दिव्य पंछियों को
और दुःख से भर गया हृदय मेरा
सबकुछ बदल गया है तब से
जब धुंधले प्रकाश में
पहली बार इसी किनारे
उनके पंखों कि फड़फड़ाहट सुनी थी मैंने
और मैं धीमे -धीमे चल रहा था |
थकान से ये प्रेमी जोड़े
तैरते हैं सर्द-सुखदायी जल पर
या आरोहण करते हैं पवन में ;
उनके हृदय बूढ़े नहीं हुए हैं अभी
उत्तेजना और विजय साथ है उनके
और वे विचरते हैं अपनी स्वेच्छा से |
पर अब वे तैरते हैं मंद प्रवाह में
रहस्यमयता से ,सुन्दरता से ;
पता नहीं कौन सी सरहरी में निर्माण करेंगे
कौन से पोखर के छोर पर दिखेंगे
किन आँखों का नूर बनेंगे
शायद मेरे जागते ही उड़ जाएंगे कहीं और ?
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