Sunday, September 25, 2022

EASTER 1916 - W.B.Yeats

 EASTER 1916    

- W.B.Yeats



ईस्टर  १९१६--विलियम बटलर येट्स

 

रोज़ उनसे दिन ढ़लते  ही मैं रूबरू होता हूँ  

भिन्न -भिन्न  साफ़-सुथरे चेहरों से  

कभी आते हुए या फिर जाते  हुए 

अठारवीं शताब्दी  के धूमिल घरों से  |

अक्सर सिर झुकाकर करता हूँ अभिवादन 

मुस्कुराकर या कहकर  निरर्थक शब्द ,

या फिर यूँही कुछ देर वहाँ ठहरकर 

दोहराता हूँ  मुस्कुराकर निरर्थक शब्द ;

कभी करता हूँ ठठ्ठा उनसे 

या सुना देता हूँ  कोई वाकया

हँसाने के लिए उन्हें 

बैठे-बैठे अलाव के इर्दगिर्द  क्लब में :

यह निश्चित जानते हुए कि मैं और वे 

सभी रहते हैं उस देश में 

जहाँ सतरंगी जिन्दगी जी जाती है :

यकायक सब बदल गया 

पूरी तरह से बदल गया 

एक खौफ़नाक सुन्दरता का जन्म हुआ!


उस स्त्री के दिन बीतते थे

अक्सर अच्छी-अनजानी बातों में,

रात बीतती थी  गंभीर तर्क-कुतर्क में---

 वाणी उतनी ही मधुर और जोशीली 

जितनी गुणवती  और सुन्दर वह !

 

यह  पुरुष था एक अच्छा अश्वारोही  

 एक पाठशाला का आधारस्तम्भ  ;

यह दूसरा उसका मददगार और मित्र 

था जोशीला ,एक उगता सूर्य ;

इस स्त्री का जोश दिला जाता उसे शोहरत अंत में ,

क्योंकि स्वभाव से थी वह बहुत खुशरंग  ,

और विचार थे बिंदास और शालीन |

इस  आदमी के बारे में मैं जानता हूँ  

कि वह है शराबी-कबाबी ----

एक घमंडी गँवार !

इसने हृदय में बसी मेरी प्रिया की जिंदगी 

जहर से भर दी है,

तब भी गुनगुना रहा हूँ उसके लिए मैं एक गीत ;

उसने भी  किरदार निभाया है 

इत्तेफाकन सुखान्तिका में ;

वह भी बदल गया है इस दौरान , 

पूरी तरह बदल गया है:

एक खौफनाक सुन्दरता का जन्म हुआ है !


 पथराए हुए हृदय 

मन्त्र-मुग्ध हैं इकलौते लक्ष्य से--- 

ग्रीष्म और शीत ऋतू में हर समय  

खड़े हैं अडिग चट्टान जैसे   

बीच कलकल बहती नदिया के | 


सड़क पर सरपट दौड़ता अश्व ,

पँख फड़फड़ाकर मेघों में उड़ान भरते पँछी

बदलते हैं हर क्षण ,

मेघों का लहराता अक्स कलकल बहती नदिया में 

पल-पल बदलता है ;

अश्व दौड़ते हैं  नदी किनारे;

मुर्गे बाँग  लगाते हैं, 

मुर्गियां उछलकूद करतीं है;

पल-पल सब जीते हैं 

बन चट्टान 

बीच जीवन के | 


 एक बहुत  बड़ा त्याग  

हृदय को पत्थर बना देता  है |

अरे ,क्या यह पर्याप्त  नहीं है ?

ईश्वर- इच्छा है यह ,

हमारा दायित्व है गिनाना एक के बाद एक  नाम ,

जैसे  माँ स्नेह से नाम बुदबुदाती है 

गोद में सोते अपने बच्चे का!

यह रात नहीं तो और क्या है |

नहीं,नहीं,यह रात नहीं 

बल्कि है मृत्यु !

क्या यह एक फालतू मृत्यु थी  ?

क्योंकि हमें विश्वास है कि इंगलैंड अपना वादा पूरा करेगा |

हम जानते थे उनके स्वप्न ,

पर्याप्त  थे उनके  स्वप्न

सार्थक  थी उनकी मृत्यु ;

और क्या हुआ गर वे  भटक गये 

सिर पर कफन बाँध निकल पड़े 

मृत्यु की राह पर !

मैं गीत  लिख रहा हूँ 

मैकडोनघ  और मैकब्राइड 

कोनोली और पीअर्स के लिए 

क्योंकि  वर्तमान और भविष्य में 

जहाँ कहीं भी और जब भी 

आयरिश हरियाली को ओढेंगे,

सबकुछ ,बहुत कुछ बदल जायेगा ;

एक खौफनाक सुन्दरता का जन्म होगा !

@Chandrashekhar B.Sharma [All Rights Reserved]


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