Daddy
BY SYLVIA PLATH
डैडी
बस करो ,
बस करो तुम
इससे ज्यादा ना करो
ओ काले जूते ,
पहन चुकी हूँ तुम्हें
एक पाँव की तरह
तीस वर्षों तक!
गल चुकी हूँ
सड़ चुकी हूँ
हो चुकी हूँ झक्क सफेद
बेचारगी की तह में
घुटती रही
मरती रही
जी भरकर साँस भी
न ले सकी
न मार सकी कभी
आँ… आँ...छी!
डैडी ,
मुझे मारना ही था
तुम्हें।
मगर तुम पहले ही चल दिये
मौका दिए बगैर ...
संगमरमर की तरह जड़,
ईश्वरीय रंगों से सने
एक स्याह
विशालकाय
डरावने
बुत
फ्रिस्को सील की तरह
एक खौफ़नाक जानवर...
ज़ेहन इतना गहरा,
जैसे हो एक सहरा
इतना झक्की
अटलांटिक समुन्दर हो जैसे
अस्थिर
वहमी!
समुद्री हरा रंग
जहाँ घुलता है
नील- गगन रंग में
वहाँ लहराती
खूबसूरत लहरें के बीच
दुआ सलामती की
माँगा करती थी मैं
तुम्हारे लिए…
क्या?
क्या तुम्हारे लिए
करती थी दुआ?
जर्मन जुबान में,
पोलेंड के एक गाँव में
बस होता था
घमासान,
सिर्फ घमासान
घमासान।
परन्तु गाँव का नाम था
सिर्फ आम।
मेरी सहेली ने बताया
वहाँ है
अनगिनित गाँव
इसलिए जान न सकी मैं कभी
कहाँ के थे तुम,
किस जमीं पर तुमनें
पाँव धरा था
किस जमीं में
फैली हुई थी
तुम्हारी जड़ें,
गुफ्तगू भी
तो न कर पायी
तुमसे कभी
मैं!
ज़ुबाँ
हलक में
अटक गई हो जैसे!
फँस गयी जैसे
काँटेदार तारों
के जंजाल में…
आ...आ...आ,आ,
मुँह से कभी
एक बोल भी नहीं फूटा।
लगा जैसे कि
तुम
जर्मन हो!
तुम्हारी वाणी बेहुदा
और भाषा अशलील!
एक इंजिन
एक इंजिन
हाँ
एक हाँफते इंजिन
की तरह
मुझे यहूदी बना दिया…
Dachau, Auschwitz, Belsen
से यातना -गृह कैदी
एक यहूदी!
हीम-आच्छादित टैरोल की चोटियाँ,
विएना की शुद्ध मदिरा
ना शुद्ध है
ना ही खालिस।
बंजारे
मेरे पूर्वज
और ये टैरो कार्ड की गड्डी
में दबी एक खोटी तकदीर ने
मुझे बहुत हद तक
यहूदी बना दिया।
ख़ौफ़ज़दा रही तुमसे
अक्सर मैं,
तुम्हारी ऊँची
हवाई उड़ानों से,
तुम्हारी अंतहीन
बड़बड़ाहट
बकवास से...
तुम्हारी मूँछें
तुम्हारी चुभती
आर्य -वंशी
नीली आँखों से...
डरावने
बेहद खौफ़नाक
हो तुम!
ईश्वर
तो तुम थे ही नहीं
बस एक स्वस्तिक
स्याह काले इतने
आसमाँ की चीख़ भी
भेद ना सके तुम्हें!
अक्सर औरतें
पूजती है फ़ासिस्ट मर्दों को,
एक जानवर को,
वहशी दरिंदों को
एक जानवर को!
सामने ही तो टँगे हो तुम डैडी
इस तस्वीर में
एक ब्लैकबोर्ड की तरह,
पाँव के पँजे में दरार होने की बजाय
ठोढ़ी में है तुम्हारी;
तुम उस स्याह काले आदमी से भी
गयेगुजरे हो
उससे भी बड़े शैतान हो
जिसने
मेरा मासूम
सुर्ख़ लाल दिल
दो टुकड़ों में बाँट दिया...
मैं दस की थी
जब वे
दफना आये थे तुम्हें
बीस की होने पर
खुद को
खुशी देने की
नाकाम कोशिश की...
तुम्हारी कब्र में उतरकर
दफन होना चाहा…
तोड़ देना चाहा यह जिस्म
ख़ाक करनी चाही यह रूह
मगर उन्होंने
खेंच लिया ताबूत से बाहर
जोड़ दिए टूटे जिस्म
के हिस्से...
तब पहली मर्तबा
समझी
मुझे क्या करना होगा
अब...
अपना पैरोकार बना लिया
स्याह काले आदमी तुम्हें!
और पाया मैंने
सिर्फ संघर्ष
सिर्फ मेंकन्फ
दर्द
धोका
घृणा!
बस हाँ, हाँ ,
करती रही मैं,डैडी।
खैर डैडी!
मैं फ़ारिग हो गयी।
वह स्याह काला टेलीफोन
गूँगा हो चुका है,
हलक में आवाज़
घुट चुकी है
उसकी!
गर मुझे मारना होता एक आदमी
तो मैं दो को मारती...
एक पिशाच ने कहा कि वे तुम थे,
जिसने साल भर मेरा खून पिया,
जानना चाहते हो कितने साल?
सात !
डैडी अब तुम मर जाओ!
तुम्हारा दिल में मैल है
कोयले सा स्याह काला !
और गाँव वाले यह जानते हैं
नापसन्द करते हैं तुम्हें!
अक्सर नाचते हैं
कूदते हैं क़ब्र पर तुम्हारी
उन्हें पहले से पता था
कि वो तुम ही थे!
डैडी!डैडी!
हरामी
वो तुम ही थे!
खैर मैं तो
फ़ारिग हो चुकी हूँ
तुमसे!

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