Monday, September 26, 2022

Dover Beach – MATTHEW ARNOLD

 Dover Beach

– MATTHEW ARNOLD


 रात घनेरी

खामोश समुन्दर प्रहरी 

जलडमरूमध्य ने चाँदनी ओढ़ी

ज्वार ने सीमाएँ तोड़ी;

फ्रांसीसी तट जगमगाता पल पल

स्याह रात करती

रौशनी को ओझल ;

चट्टानें विशाल होती देदीप्यमान 

इंग्लैंड तट पर तटस्थ 

खाड़ी शाँत 

सदियों से विराजमान।


आओ इस झरोखे पर सखी ,

मन्द मन्द मधुर रत-पवन बह रही  है...

समंदर  चूम रहा 

चाँदनी से लिपटी जमीं को जहाँ

सुनो,वहाँ!

सुन रही हो  ना तुम

कंकड़ों का  कर्कश गर्जन 

जो लहरों संग लहरा रहे हैं

कभी 

आ रहे हैं

 जा रहे हैं…


 लहरें भी

आ रही हैं

कभी  लौट रही हैं

लहराती हैं

कम्पकपाती हैं

गुनगुनाती हैं रुदाली -गान ,

छेड़ती है भीतर 

रूह - रगों में 

उदासी की अनंत अविरल तान।


सदियों पहले सोफोकलस ने 

 एजियन तट पर सुना था ,

मानव- दुख का आलाप

ज़ेहन में रिसने लगा था  उसके

 एक अंतहीन  प्रलाप-सैलाब ;

दूरस्थ उत्तरीय समंदर तट पर

 संताप-क्रंदन के कोलाहल में 

हम भी सुनते हैं प्रिये

वही रुदन

वही मानव-गान

अनंत पीड़ा-गान...


बरसों पहले ,

आस्था का समंदर 

लबालब भरा था,

चटकीली करधनी से तट 

घिरा पड़ा था।



मगर अब 

सिर्फ सुनता हूँ मैं

उसका

 उदास-अंतहीन

लौटती लहरों संग लिपटा रत-गान

समंदर तट पर टहलती

एक लम्बी  दुख-तान

 रत-पवन संग लहराती है

नग्न कंकड़ों को 

सन्नाटे में  नहलाती है...



आह!

सच्चे रहें हम 

एकदूजे संग प्रिये!

ये दुनिया है एक मकड़जाल

दिखाती है हमें 

ख़्वाब बेहद खूबसूरत 

नये नवेले 

अनोखे-अनजान...

असल में 

ना  इन ख्वाबों में खुशियों का डेरा है,

ना यकीन,ना मुहब्बत का बसेरा है,

ना ही रोशनाई जगमगाती है

 ना सुकूँ की साँस आती है ,

ना दुख दूर होता है

सिर्फ और सिर्फ

अज़ाब का पहरा है…


और हम 

गहन तमस में उलझ गए हैं

स्याह-काले मैदाने-जंग में 

आपस में भिड़ गयी 

अनजान-अनोखी सेनाओं के बीच 

फँस गए हैं...



@Chandrashekhar B.Sharma [ALL RIGHTS RESERVED]


2 comments:

  1. Nice. Would prove a great deal of help for understanding the literature.

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  2. Very beautifully composed with apt rhyme scheme.

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