The Two Trees--William Butler Yeats
दो वृक्ष --विलियम बटलर येट्स
प्रिये, झाँको अंतर्मन की गहराइयों में ,
उग रहा है वहाँ एक पावन वृक्ष;
फूँट रही है खुशियाँ पावन शाखाओं से ,
और खिलखिला रहे हैं उनपर रंगबिरंगे पुष्प|
फलों के बदलते रंगों ने बिखेर दी है
खुश-रंग रोशनी सीतारों पर;
गहराइयों में फैली उसकी जड़ों ने
पसरा दी है रात्रि में चहुं ओर ,शान्ति;
उसकी घनी पत्तियों ने फड़फड़ाकर
लहराकर
दे दिया है लहरों को उनका संगीत,
और मेरे अधरों पर
संगीत के चुम्बन ने गुनगुना दिया है
तुम्हारे लिए एक जादुई गीत!
देखो! मदमस्त हो इश्क़ नृत्य कर रहा है,
हाय! जोशीला इश्क़ हमारे बीते दिनों का !
घूर्नन! आवर्त!
वृत्त में घूमता इश्क़ !
तेज भँवर में इठलाता हुआ
अपने अनोखे-अनजान अंदाज़ में ;
याद आती हैं तुम्हारी लहराती जुल्फें
और पंख लगे तुम्हारे नृत्य करते पाँव,
वह सुरमयी प्रेम-रस में डूबी आँखें: :
प्रिये,झाँकों हृदय में अपने ---
अपने ही अंतर्मन में !
पर न निहारो कभी
ऐसे आईने में खुद को
जो दानवों की मक्कारियों से,
कड़वाहट की धुँध से
धुँधला हो चुका है --
क्योंकि उसमें पनपने लगा है एक प्रतिबिम्ब
जो एक तूफानी रात है ,
उसकी जड़ें अध-छुपी हुई हैं परत-दर-परत बर्फ में,
टूटी है शाखाएँ और स्याह काली है पत्तियाँ :
क्योंकि हर चीज़ घूमफिरकर हो जाती है बंजर
दानवों के दिखाए हुए धुँधले आईने में,
थके हुए बाहरी आवरण का आइना,
बीते दिनों का सृजन,जब देवता सो रहे थे!
देखो !वहाँ उन टूटी हुई शाखाओं से
डैने फड़फड़ाकर गुजर रहें हैं कौए ,बदहवास!
प्यासे कँठों से चीखते हुए --
काँव-काँव करते हुए ,
नुकीले पँजों से नोचते -खसोटते हुए!
या फिर अंधड़ में नुचे हुए डैने को फड़फड़ाते हुए;
हाय!
तुम्हारी रसभरी आँखें बन जातीं है चिंगारी ;
जानेमन देखो न खुद को काले-स्याह आईने में !
@Chandrashekhar B.Sharma [ALL RIGHTS RESERVED]
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