THE WHITE BIRDS-W.B.YEATS
श्वेत पंछी --विलियम बटलर येट्स
काश हम होते ,मेरी प्रिये,श्वेत पंछी
और अठखेलियाँ करते फेनिल उदधि की लहरों पर!
हमें ऊब जाना चाहिए उल्का की चमक से ,
इससे पहले की वह क्षीण और लुप्त हो जाए ;
और सांध्य -प्रकाश के नीले तारे की उस चमक से ,
जो पसरी रहती है किनारे व्योम के !
उसने पसरा दी है हमारे दिलों में ,मेरी प्रिये,
एक गहरी उदासी,असीम!
ऊब हो जाती है उन स्वप्नदर्शियों ,
शबनम -बौछार से नहाये गुलाब और कुमुदिनी से ;
आह,स्वप्न न देखो,मेरी प्रिये,उस उल्का की चमक के
जो कुछ पलों में क्षीण हो जाएगी ,
या फिर वह चमक नीले तारे की
जो रौशन हो जाती है हौले-हौले
शबनम के नीचे गिरने के संग-संग :
चाहता हूँ मैं
कि हम तब्दील हो जाएँ श्वेत पंछियों में
फड़फड़ाते हुए पंख परवाज़ भरें फेनिल उदधि पर :मैं और तुम!
मुझे याद आते हैं असंख्य द्वीप ,
और बहुतेरे किनारे दनान के,
जहाँ समय हमें बिसरा देगा ,
और दुःख छू भी न पायेगा हमें कभी ;
जल्द ही हम हो जाएंगे दूर
गुलाब और कुमुदिनी से,
और बन जायेंगे फड़फड़ाहट लौ की ,
काश हम होते श्वेत पंछी,मेरी प्रिये ,
फेनिल उदधि की लहरों पर तैरते हुए !
@Chandrashekhar B.Sharma [ALL RIGHTS RESERVED]
No comments:
Post a Comment