'संगरोध' अलग अलग रंगों में!
कुछ अरसे पहले हम सभी ने कोरोना पेंडिमिक का दंश प्रयत्क्ष रूप से झेला था।अंतहीन तन्हाई के दौरान एक कविता का जन्म हुआ और लगा कि उसमें समायी हुई उलझन सभी से साझा करूँ।'संगरोध' सिर्फ हिंदुस्तानी भाषा जानने वालों तक ही सीमित न रहे,ऐसा मन में विचार आया।नतीजतन एक सफर का आगाज़ हुआ जिसमें सभी परमुख भारतीय भाषाओं में इसका अनुवाद करने का प्रण किया।एक एक करके कारवाँ बढ़ता गया और करीब 35 भाषाओं में ' संगरोध' का अनुवाद हुआ।शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ मेरी दोस्त डॉ.उन्नति पांडे दातार का जिसने अंग्रेज़ी में सबसे पहले अनुवाद की पहल की और पूरे सफर में बहुत साथ दिया।साथ मे सभी अनुवादकों का शुक्रिया जिन्होंने समय पर अद्भुत अनुवाद करके मुझे अनुग्रहीत किया।
संगरोध
खुशियों से लबरेज खुशी
खिलखिलाकर हँसती है
घर के हर कोने में
मंडराती है
और गुनगुनाती है
तुम मेरे हो
मैं तुम्हारी…
सिक्कों की खनक
गूँज रही हो
गुल्लक में जैसे
बरखा की बूँद ठंडी
जिगर
गर्म पर
फिसल रही हो जैसे…
ये कैसी बयार है
ये किसकी क़ायनात है
जो जर्रा जर्रा महफूज़ रखती है
मुझे
और तुम्हें भी…
इक झरोखे से
इस घर के
रिश्ता पुराना है
गली से गुजरती
नंगे पाँव
एक चुभन
शायराना है…
अज़ाब उस गलियारे से
बाज़ दफे पुकारता है
किसी रेले को
घर नसीब कराऊँ
यह कहता है…
ज़ेहन का तिलस्म
खुशियों की बेड़ियों से
बंधा है
हकीकत तेरा आईना
कोसों दूर टँगा है...
@Chandrashekhar B.Sharma[ALL RIGHTS RESERVED]
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