बलराम चंद्राकर
खुशी लबालब भरे हे
खिलखिला के हांसत हे
ए डेहरी ले ओ डेहरी
घर मं बूलत बूलत
गावत रहिथे
तंय मोर मंय तोर
जइसे सिक्का
गुल्लक मं खनखनाथे
जुड़हा बूंद ह
बरसाके बइसने
अंतस के ताप मं
फिसलत मनहा
पुचकारथे
जे कइसन हवा ये
कहाँ ले आवत हे
जऊन मन के
कोना कोना ला
छू लेथे मोरो
अऊ तोरो
ये झरोखा ले
ए घर के
नाता जुन्ना ए
गली ले रेंगत खाली पांव
कांटा चुभत तो हे
फेर कविमन जैसे हे
मन के पीरा
कोनो सँकरी गली ले
घेरी बेरी पुकारथे
कोनो भीड़ ला कहिथे
एकठन घर चांहीं
ए कहिथे
मन जइसे कोनो जादू हे
खुसी के सांकल मं बंधे
असल ए तोर दरपन हे
जेन बहुते दूरिहा मं टँगाये हे

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