*लोकडोन*
मुल मुल हंसदी ख़ुशी,
घोरर का कोना कोना मा,
दबड़ियांदी, बच्यांदी ख़ुशी सब जगा...
तू मेरु अर मै तेरु।
गुल्लक जन च गूँजनी,
सिक्कू की खनक
जिकुड़ा माँ बरखै की बूंद जन ठंडी तड़तडी पड़नी गर्म पर।
अहा !
कन बयार बथु च !
कैकी च य क़ायनात ?
जो सब्बू थै कुशल रखदी...
ज़रूर क्वे पुराणु
नातू च,
ये घोर वे ते घोर तक
गली बीटी एक चुभन,
नांगा खोटा,
शायराना मिजाज़ मा...
ते गली बिटी,
अज़ाफ़ कभी कभी बुलौन्द च मैकु
मन करद कि क्वे रेला तै
घोर दी दुयों..
ख़ुशू की बेढी मा बंधू च,
मन कु मायाजाल,
पर हक़ीक़त कु आईना
भोत दूर च..
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