SANDHYA MISHRA
हर्ष से हर्षित हर्ष
हसत हे
हसा्वत हे
घर के हर कोना में
इठलावत हे
गुनगुनावत हे
तू हमार हे
आऊ हम तोहर.....।।
पैसा के झनझनाहट
गुंज रहत हे
मट्टी के टूईंया में जैसे
बरखा के बुन
पड़ल हे
गरम छतिया पर
फिसल रहल हो जैसे......
कहां से चलल हो देखी
मंद मंद पवन
कौन हे विधाता
ई जगत के
हरदम
जो रक्षा करत हे
हम्मर आऊ
तोहर....।।।।
ई खिडकी से
ई घर के
पुरान सम्बन्ध हे
गली कुची मे
टहलत हे खाली पाव
एक दुख
काव्यात्मक भावना हे......
नरक उ गली कुची से
बार बार पुकारत हे
कौन अभागा के
घर बनाई
यही कहत हे.....।
हर्ष की बेड़ी से
बंधल हे
दिल आउ दिमाग के चक्रव्यूह
सत्य तोहर दर्पण
कोसो दूर टंगल हे

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