Wednesday, June 28, 2023

Aboriginal Landscape : LOUISE GLÜCK Translated into Hindustani by Dr Chandrashekhar B. Sharma



Aboriginal Landscape

BY LOUISE GLÜCK


आदिम मंज़र


अब्बा की कब्र पर तुमने पैर रख दिए हैं,

 अम्मी ने कहा,

और यकीनन मैं खड़ी थी बीचोबीच,

करीने से कटी हुई घास में

हो सकता है 

 ये कब्र  मेरे अब्बा की हो

वैसे यहाँ कोई पत्थर पर खुदी 

इबारत भी तो नहीं!


फिर पैर रख रही हो अब्बा पर,

अम्मी ने दोहराया,

इस मर्तबा लगभग चीख़ कर,

अजीब लगने लगा मुझे,

क्योंकि वे पहले ही फ़ौत हो चुकी थीं;

 हक़ीम ने भी

 यही तो कहा था।



मैं एक तरफ थोड़ा सरक गयी,

जहाँ अब्बा की कब्र खत्म होती है 

और अम्मी की शुरू।


क़ब्रगाह में सन्नाटा पसरा है।

दरख्तों के सब्ज़ पत्ते हवा से फड़फड़ा रहे हैं;

मुझे सुनाई दे रहा था ,

बहुत धीमे

 रुदन...

 बहुत दूर से ,कई सफ़ बाद,

 कुत्ते का विलाप।


कुछ समय बाद ये आवाजें आना कम हो गयीं।


मेरे मन में एक सवाल उठा

 मैं यहाँ आयी क्यों,

कुछ याद नहीं आ रहा;

जो अब 

दिख रही है एक  क़ब्रगाह ,

असल में मेरे ज़ेहन में बसी क़ब्रगाह है;

शायद ये कोई बाग़ था,

गर बाग़ नहीं ,

फुलवारी या बागीचा, 

खुशबू से महकता हुआ

मैं महसूस कर रही हूँ,

सुर्ख़ गुलाबों की खुशबू से महकता गुलज़ार...

ख़ुशगवार हवा में महकती खुशबू,

खुशनुमा जिंदगी,

जैसे अक्सर कहा जाता है।


एक वक्त आया,

जब महसूस हुआ मैं तन्हा हूँ।

कहाँ गये सब,मेरे भाईबंधु,

मेरी बहनें ,केटलिन और अबिगेल?


रोशनी धूसर हो रही है...

कहाँ है हमारी कार 

जो इंतज़ार कर रही थी हमारा

 घर ले जाने के लिए?

मैंने दूसरा इंतज़ाम करने का सोचा। 


बेसब्री बेइंतहा बढ़ने लगी,

शायद बेचैनी।


आखिरकार, 

दूर से एक छोटी रेलगाड़ी बना ली मैंने,

 उसे रोक भी लिया,

झाड़ियों के पीछे लगा,

जैसे एक कंडक्टर डिब्बे के दरवाज़े पर खड़ा है, 

सिगरेट के कश लगाते हुए।


मुझे भूल मत जाना,मैंने चिल्लाकर कहा, 

दौड़ने लगी उसकी ओर,

लाँघ गयी कई अम्मी-अब्बा---


मुझे भूल मत जाना,मैंने चिल्लाकर कहा,

आखिरकार ,जब मैं उस तक पहुँच गयी।


मोहतरमा,उसने कहा, 

पटरियों की ओर इशारा करते हुए,

यकीनन तुम्हें समझ आ गया होगा 

ये अंत है, 

इसके आगे पटरियाँ कहीं नहीं जातीं।


उसके अल्फ़ाज़ बेहद सख़्त थे,

मगर आँखों में रहमदिली;

यह देखकर मेरा हौसला बुलंद हुआ

 और अपनी बात मनवाने की 

पुरजोर कोशिश करने लगी मैं।

मगर वे वापस भी तो लौटतीं हैं, मैंने कहा,

बड़ीं सख़्त जान हैं,

जैसे बहुत बार वे लौटती हों।


ऐसा है, उसने कहा, हमारा काम बेहद मुश्किल है:

अक्सर हमारा राब्ता गम और मायूसी से होता है।

बड़ी साफदिली से उसने नज़रें गड़ाई मुझपर ।

मैं पहले 

तुम्हारे जैसा था,उसने कहा,

मुझे फ़साद से मुहब्बत थी।


अभी मैंने एक पुराने दोस्त जैसी बात की है:


क्या इरादा है तुम्हारा,मैंने कहा,

क्योंकि वह लौटने वाला था,

क्या तुम्हारी इच्छा नहीं घर वापस जाने की,

शहर फिर से देखने की?


ये मेरा घर है, उसने कहा।

शहर--

ये शहर ही तो है 

जहाँ मैं गायब होता हूँ।

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