Sunday, June 18, 2023

AN INTRODUCTION -- Kamla Das Translated into Hindustani by Dr. Chandrashekhar B.Sharma


एक परिचय
AN INTRODUCTION
--कमला दास
मुझे राजनीति  करना नहीं आती
पर मालूम  है मुझे
सत्ताधारियों के नाम
और दुहरा सकती हूँ उनके नाम
जैसे एक हफ्ते के दिन ,
महीनों के नाम ,
नेहरु से शुरुआत करके |
मैं भारतीय हूँ ,गेंहुआ  , रंग है मेरा ,
मालाबार में जन्मी ,
बोल सकती हूँ तीन भाषाएँ ,
दो में लिख सकती हूँ ,
और स्वप्न देखती हूँ सिर्फ एक में !
अंग्रेजी में न लिखो ,उन्होंने कहा--
अंग्रेजी तुम्हारी मातृभाषा नहीं है |
मुझे अकेला क्यों नहीं छोड़ देते
आलोचक,दोस्त,भाई-बंधू ,
आप सभी ?
क्यों नहीं मैं बोल सकती
जो भाषा मुझे पसंद है ?
जो भाषा मैं बोलती हूँ
बन जाती है वह मेरी ,
उसकी अशुद्धियाँ
उसकी विलक्षणता
सभी मेरी
सिर्फ मेरी |
वह आधी अंग्रेज है
आधी भारतीय ,अजीब सी,
पर मानवीय
उतनी ही जितनी मैं मानवीय
उतनी ही जितनी मैं मानवीय हूँ |
क्या तुम नहीं देख सकते ?
ये अभिव्यक्ति है मेरी खुशियों की ,
मेरी अभिलाषाओं  ,मेरी आशाओं   ,
और मेरे काम की ,
जैसे कौवों  के लिए कांव -कांव
और शेरों  के लिए गर्जना --
यह वाणी मानवीय है --
वाणी जेहन की
जो इधर है
पर उधर नहीं ,
जेहन जो देख और सुन सकता है
और चौकन्ना है !
नहीं !बघिर नहीं ,
अंधी वाणी नहीं
तूफानों और मानसून के बादलों सी
या बरखा सी या बेमेल बुदबुदाहट 
धधकती चिता सी |
मैं बच्ची थी ,
पर उन्होंने कहा मैं बड़ी हो गयी हूँ
क्योंकि मैं लम्बी हो गयी
और मेरी देह भर गयी --
एक दो जगह पर बाल भी उग गये |
जब मैंने प्यार माँगा ,
न जानते हुए क्या माँगना चाहिए ,
तब एक सोलह वर्षीय जवान
मेरे शयनकक्ष में घुस गया
और उसने दरवाजा बंद कर लिया !
उसने मुझे मारा पीटा नहीं ,
पर मेरी उदास थकी देह घायल हो गयी |
मेरे वक्षों और योनि का भार और दर्द ,
कुचलने लगा मुझे|
मैं दर्द से कराह उठी
 खुद में सिमट गयी |
तब...
एक कमीज़ पहनी
और नजरंदाज़ करने लगी
अपने स्त्रीत्व का !
साडी पहनो,
लड़कियों जैसी रहो ,
पत्नी बनो ,कहा उन्होंने |
कसीदेकारी   करो,
बनाओ खाना ,
और लड़ों नौकरों से |
निभाना सीखो ,
योग्य बनो --
चिल्लाया वर्गभेदियों  ने |
दीवारों पर ना बैठो ,
ना झांको खिडकियों से |
एमी   बनो
या बनो कमला --
या ज्यादा अच्छा होगा
 बनी रहो माधवीकुट्टी ,
समय आ गया है
चुन लो अपना नाम
अपना अभिनय
अपना काम |
मिथ्या खेल न खेलो
 बावरी न बनो ,
बनो परी या अप्सरा |
गला फाड़कर रोओ नहीं
जब इश्क में धोखा  खाती हो ...
मैं रूबरू  हुई थी
एक मर्द से ,
उससे प्यार किया मैंने |
नहीं पुकारो
 किसी नाम से उसे 
हर  वह मर्द है
जो एक औरत की चाह रखता है ;
जैसे मैं हर वह औरत हूँ
 जो मर्द को चाहती है |
उस मर्द में .....
वासना भूखी  नदियों की ,
और मुझ में
उदधि का थका देने वाला
 इंतज़ार !
कौन  हो तुम?
पूछती हूँ हर एक से
और  उत्तर --वह मैं हूँ !
हर जगह ,
चहुं ओर
 देखती हूँ मैं उसे
जो स्वत: को मैं कहता है
इस संसार में
वह दृढ़ता से फंसा हुआ है
जैसे मयान  में तलवार!
मध्यरात्रि के बारह बजे
 वह मैं हूँ
जो तन्हा पीती हूँ
 होटलों में
 अजीब- अनोखे शहरों में |
वह मैं हूँ
 जो हँसती हूँ ,
वह मैं ही हूँ
जो इश्क करती हूँ --
और शर्मिंदा होती हूँ  फिर !
वह मैं हूँ
जो गले की गरगराहट  के साथ
मरती हूँ |
मैं पापिनी हूँ ,
मैं सन्यासिनी हूँ --
हूँ प्रेयसी
और परित्यक्ता भी !
मेरी कोई खुशियाँ नहीं
जो तुम्हारी नहीं हैं --
कोई दर्द नहीं
 जो तुम्हारे नहीं है |
मैं भी खुद को 'मैं' पुकारती हूँ !

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