ऑनर किल्लिंग
HONOUR KILLING
--इम्तिआज़ धरकर
आख़िरकार इस कोट को मैं उतार फेंक रही हूँ
यह काला कोट मेरे देश का
जो मैं कसम खाती थी
कि वो मेरा है ,
जिसे मैं आदतनुसार ज्यादा पहनती थी ,
डिज़ाइन के कारण नहीं |
जन्म से ही पहने हुए हूँ
मुझे लगता था
मेरे पास कोई विकल्प नही है |
मैं यह पर्दा उतार रही हूँ -
यह काला पर्दा आस्था का
जिसने मुझे नास्तिक बना दिया
खुद के प्रति ,
जिसने मेरे लबों को सिल दिया ,
मेरे ईश्वर को एक शैतान का रूप दे दिया ,
और मेरी आवाज़ को दबा दिया |
मैं उतार फेंक रही हूँ
यह गोटेदार रेशमी कपड़े ,
जो तानाशाही स्वप्नों को पोसते है --
यह मंगलसूत्र और अंगूठियाँ
जो खड़खडा रहीं हैं
जरूरतों के टिन के कटोरे में ,
इन्होने मुझे भिखारन बना दिया |
मैं यह चमड़ी उतार रही हूँ ,
और फिर चेहरा ,मांस ,और कोख |
चलो देखते हैं
मैं क्या रह जाती हूँ
जब मैं निचोड़ती हूँ बीते कल को -
एक आसान सा हड्डियों का पिंजरा |
चलो देखते हैं
मैं क्या कर सकती हूँ ,
बनाती हूँ ,कारीगरी करती हूँ ,
और नक्शा बनाती हूँ
अपने नये भूगोल पर |

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