बर्फ़ हो जाना …
उस सर्द सुबह
जब बादल
मेरे ऊपर किसी ख़ामोश अदालत की तरह झुके थे,
मैंने एक दरिया को देखा
जो बहते-बहते
अचानक ठहर गया था।
जैसे उसे
अपने ही सफ़र से
थोड़ी देर की मोहलत चाहिए थी।
उसने अपने होंठ
बर्फ की महीन सिलाई से बंद कर लिए।
मैंने सोचा—
शायद यह हार नहीं,
सिर्फ़ वक़्त से
एक छोटा-सा समझौता है।
कभी-कभी
मैं भी ऐसा ही करता हूँ।
अपने ख़यालों को
थोड़ा मोड़ देता हूँ,
जैसे हवा
पेड़ों की शाख़ों को
धीरे से दूसरी तरफ़ झुका देती है।
उस दिन
एक मछली भी दिखी थी
जो बर्फ का चश्मा लगाए
जमे हुए चाँद को देख रही थी।
मुझे लगा
जैसे वह भी
अपनी दुनिया से
थोड़ा-सा एडजस्ट कर रही हो।
दूर
एक हिमखंड
समंदर में भटकता हुआ
मेरे ही ख़याल जैसा था।
उसकी पीठ पर बैठी घड़ी
वक़्त को ऐसे गिन रही थी
जैसे हर लम्हा
किसी नई शक्ल में ढलने की
धीमी-सी मश्क़ (rehersal)हो।
मैंने तब समझा—
शायद ज़िंदगी
किसी बड़ी जंग का नाम नहीं।
यह तो बस
अपने अंदर
थोड़ी जगह खाली करने का हुनर है,
जहाँ हालात
आकर चुपचाप बैठ सकें।
कभी मैं दरिया बन जाता हूँ,
कभी बर्फ,
कभी सिर्फ़ एक क़तरा
जो अपनी ही हथेली में
नई शक्ल तलाश करता है।
और शायद
यही मेरा छोटा-सा राज़ है—
मैं हर रोज़
ज़िंदगी से लड़ता नहीं,
बस उसके साथ
थोड़ा-सा
चलने की कोशिश करता हूँ।
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Becoming Ice…
And perhaps
this is my small secret—
I do not fight life every day,
I simply try
to walk
a little
alongside it.
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