चराग़ों के धुएँ में दफ़्न एक मोहल्ला
दीवाली की शाम थी।
अभी रात ने पूरा आसमान अपनी आग़ोश में नहीं लिया था,
मगर पटाख़ों के धुएँ ने
सितारों के चेहरे पर
राख का सुरमा मल दिया था।
मैं बरसों बाद
उस पुराने मोहल्ले में दाख़िल हुआ,
जहाँ गलियाँ
बूढ़ी हथेलियों की लकीरों की तरह
एक-दूसरे में उतरती चली जाती थीं,
और हर मोड़
वक़्त की जेब में पड़ा
एक पुराना सिक्का था।
चराग़ों की लौ
ऐसी काँप रही थी
जैसे ज़मीन की पलकों पर
हज़ारों जुगनुओं ने सज्दा किया हो।
फुलझड़ियाँ
तीरगी के जिस्म पर
चाँदी की आयतें लिख रही थीं।
अनार
मिट्टी की छाती से उठते
छोटे-छोटे आतिशफ़िशाँ थे।
बारूद की बू
यादों की रगों में
अफ़ीम की तरह उतरती जाती थी।
मैं चल नहीं रहा था—
मैं अपनी ही गुज़री हुई उम्र के
एक पुराने ख़्वाब में दाख़िल हो रहा था।
फिर वह घर आया—
जिसकी चौखट पर
शायद गुजरात ने
अपना रंगीन दिल उतार दिया था।
लकड़ी के रंग-बिरंगे घोड़े,
ऊँट,
चिड़ियाँ,
गुड़ियाएँ,
बैलगाड़ियाँ,
लाख के चमकते खिलौने—
वे खिलौने नहीं थे,
बीते ज़माने की
महफ़ूज़ धड़कनें थे।
उनके रंग
ऐसे चमकते
जैसे इंद्रधनुष ने
अपनी सातों रगें
लकड़ी में छोड़ दी हों।
पूरा कमरा
किसी मुसव्विर की
अधूरी दुआ मालूम होता था।
उस घर में
दो मौसम रहते थे।
एक—
बसंत का बेक़रार झोंका।
दूसरा—
ख़िज़ाँ की ख़ामोश साँस।
पहली रेणुका
हवा की शरारत थी।
फुलझड़ी की तबीयत।
बिजली की मुस्कुराहट।
उसकी हँसी
ऐसी उड़ती
जैसे गौरैयों ने
पूरे आँगन में
अपना आसमान बिखेर दिया हो।
वह हर बात पर रूठती,
हर बात पर झगड़ती,
और अगले ही लम्हे
अपनी ही हँसी में पिघल जाती।
उसकी आँखों में
इतना बचपन था
कि वहाँ उदासी
रास्ता भूल जाती।
दूसरी
रीता
धुएँ में भीगी हुई
एक शाम थी।
उसके चेहरे पर
हमेशा
कोई अनदेखा मौसम बैठा रहता।
उसकी आँखें
ऐसे कुएँ थीं
जिनमें
आसमान भी झाँकने से डरता हो।
मेरी यादों में
एक मंज़र आज भी
ज्यों का त्यों ज़िंदा है।
उसकी हथेली में
एक छोटी-सी शीशी थी।
वह उँगली डुबोती,
फिर जल्दी-जल्दी
उसे होंठों तक ले जाती।
फटाफट
दमादम आयोडेक्स चाटती!
मैं बच्चा था।
बच्चे
मंज़र देखते हैं,
उनके मतलब नहीं…
आज भी
वह तस्वीर
मेरे ज़ेहन में
आयोडेक्स की बू की तरह
सूखती नहीं!
उस घर की हवा में
बीड़ी का धुआँ
हमेशा तैरता रहता।
ऐसा लगता
कमरे की साँसों ने
धुआँ पहन रखा हो।
दीवारों पर
कालिख नहीं,
बरसों की थकान जम गई थी।
पुराने संदूक,
पीतल के बर्तन,
धीरे-धीरे घूमता पंखा,
और बीच कमरे में
एक सफ़ेद मसनद—
इतनी सफ़ेद
कि जैसे
बूढ़े बादल का
दिल ज़मीन पर बिछा दिया गया हो।
वहीं
मैं अक्सर सो जाता।
नींद
इतनी गहरी होती
कि ख़्वाब भी
जूते उतारकर आते।
कभी-कभी
बचपन
अपने ही ख़्वाबों में भीग जाता।
मसनद भी।
मैं भी।
मगर
उस घर ने
मेरी शर्म को
कभी नाम नहीं दिया।
बस चुपचाप
चादर बदल दी,
और मेरे सिरहाने
अपनापन रख दिया।
उस दिन
मुझे मालूम नहीं था—
मोहब्बत
अक्सर डाँटती नहीं,
ढँक देती है।
फिर
कहानी में
सिक्कों की आवाज़ उतरने लगी।
अब
खिलौनों की खनक कम,
रुपयों की खनक ज़्यादा सुनाई देती थी।
पापाजी
बार-बार
अपनी पैंट की जेब टटोलते।
हर बार
कुछ न कुछ कम निकलता।
चाईजी
उसी हैरत से
उन्हें देखती रहतीं।
जेबें
जैसे छोटे-छोटे कुएँ हों,
जिनसे पानी नहीं,
एतबार ग़ायब हो रहा था।
बच्चों की दुनिया में
राज़
कंचों की तरह होते हैं—
ज़्यादा देर
जेब में नहीं टिकते।
एक लड़का
दिलीप
बिक्के की हथेली पर
आधी अठन्नी रख देता।
वह अठन्नी
धातु नहीं थी—
ख़ामोशी की मज़दूरी थी।
उस उम्र में
आधी अठन्नी
पूरा सल्तनत होती थी।
मगर
एक दिन
गुड्डी की नज़र
उस चमकते सिक्के पर ठहर गई।
"यह कहाँ से आई?"
बस इतना-सा सवाल।
लेकिन
कुछ सवाल
दरवाज़े नहीं खटखटाते,
दीवारें गिरा देते हैं।
बिक्का
झूठ की लंबी सड़क नहीं जानता।
वह सच की छोटी पगडंडी पर
दौड़ पड़ता है।
और राज़
सूखे पत्ते की तरह
सबके सामने बिखर जाता है।
बरस बीत गए।
लकड़ी के खिलौनों के रंग
धीरे-धीरे
बरसात में भीगते पोस्टरों की तरह
उतर गए।
चराग़ बुझते गए।
धुआँ रह गया।
हँसी चली गई।
उसकी गूँज रह गई।
लोग बिखर गए।
उनकी आहट रह गई।
मोहल्ला
अब नक़्शे पर नहीं,
मेरी रूह में आबाद है।
आज भी
जब दीवाली आती है,
मुझे सबसे पहले
पटाख़ों की आवाज़ नहीं सुनाई देती।
मुझे सुनाई देती है—
लकड़ी के घोड़ों की टाप,
बीड़ी के धुएँ की खाँसी,
सफ़ेद मसनद की ख़ामोशी,
एक मासूम नींद की नमी,
आधी अठन्नी की खनक,
और वक़्त—
जो आज भी
उस पुराने मोहल्ले की किसी गली में बैठा,
राख से
अपना ही चेहरा तराश रहा है।
क्योंकि याद
दरिया नहीं होती।
याद
दीवाली के अगले दिन बची हुई
वही गर्म राख होती है,
जिसमें उँगली रखो,
तो बरसों बाद भी
दिल की पोरें
हल्की-सी जल उठती हैं।
A Neighbourhood Buried Beneath the Smoke of Lamps
It was Diwali evening.
I was not walking—
Then came that house—
Wooden horses,
camels,
birds,
dolls,
bullock carts,
gleaming lacquered toys—
They were not toys.
One—
The other—
The first was Renuka—
the mischief of the wind,
the temperament of a sparkler,
the smile of lightning.
The other girl—
Rita—
She dipped a finger into it,
I was only a child.
Even today,
that image
has never dried
inside my mind—
Old trunks,
brass utensils,
and in the middle of the room—
a white mattress,
so white
Sometimes,
childhood itself
The mattress too.
And I.
Yet
that house
It simply
changed the bedsheet,
and quietly placed
a feeling of belonging
beside my pillow.
Back then,
I did not know—
love
does not always scold.
More often,
Then,
the story
Now,
Every time,
Chaiji
watched him
Those pockets
from which
not water,
but trust,
was disappearing.
In a child's world,
One boy—
Dilip—
That little coin
was not metal.
At that age,
half an eight-anna coin
was an entire kingdom.
But then,
one day,
Guddi's eyes
stopped
upon that shining coin.
"Where did this come from?"
Just one small question.
Yet
some questions
Bikka
did not know
He ran instead
And the secret,
like a dry leaf,
scattered itself
before everyone.
Years passed.
slowly faded,
like posters
The lamps
went out.
Only the smoke remained.
The laughter
departed.
Only its echo remained.
The people
drifted away.
Only their footsteps remained.
That neighbourhood
It lives instead
inside my soul.
Even today,
when Diwali returns,
Instead,
I hear—
and Time—
which still sits
in some forgotten lane
of that old neighbourhood,
carving
its own face
out of ash.
Because memory
is not a river.
Memory
is the warm ash
left behind
the morning after Diwali.
and even after years,
still burn
ever so slightly.
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